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जुनैद, ओखला और हम

22 जून को लोकल ट्रेन में निज़ामद्दीन स्टेशन से बैठे जुनैद को ओखला स्टेशन पर चढ़े कुछ लोगों ने बल्लभगढ़ स्टेशन तक पहुंचते पहुंचते क़त्ल कर दिया और उसके भाई को बुरी तरह ज़ख्मी कर दिया। पूरे मुल्क में इस बहीमाना ज़ुल्म के ख़िलाफ एहतजाज हो रहे हैं। मगर ख़ुद ओखला ख़ामोश है।

कल ओखला में सरगरम तीन सोशल नेटवर्क से जुड़े वॉलंटीयर्स ने यह चुप्पी तोड़ी और ओखला स्टेशन पर एक पेम्फलेट तक़्सीम किया जिसका मक़सद डेली पेसेजर के ज़मीर को जगाना था कि वे अगर किसी मासूम पर ज़ुल्म को देखें तो ख़ामोश न बैठें बल्कि उसे रोकने की कोशिश करें।

इस मुहिम को अभी एक घंटा भी न गुज़रा था कि कुछ ऐसे लोग भी वहां पहुंच गये जिनको अमन का यह पैग़ाम मंज़ूर नहीं था। बहरहाल तबतक क़रीब 4000 पेम्फलेट तक़सीम हो चुके थे और एक मेसेज दिया जा चुका था, जिसे आम लोगों ने बहुत पसंद किया। इस अमन मुहिम की मुख़ालफत देखकर वॉलंटीयर्स ने वापसी करली।

मगर यह अंदेशा कि ओखला इंडस्ट्रियल एरिया और यहां के चंद इलाकों में फिरक़ापरस्ती परवान चढ़ रही है सही साबित हुआ।

जुनैद का क़त्ल इसी की एक बानगी है। यही वजह है कि उन दो भाइयों से झगड़ा करने वाले चंद बदमाशों को रोकने के बजाय लोग उनका हौसला बढ़ाते रहे। ओखला और मुल्क की राजधानी दिल्ली में अमन के लिए यह एक चेतावनी है।

ओखला वह इलाक़ा है जहां 1947 में हालात के मारे लोग उस वक़्त पनाह ले रहे थे जबकि पूरी दिल्ली दंगों की आग में जल रही थी। उनके लिए कालकाजी में टेंट लगाये गये और खाने का इंतज़ाम किया गया। उस वक़्त जामिया मिल्लिया के टीचर्स और स्टूडेंट्स ने पहाड़गंज और क़रोलबाग़ में कई दिनों की मेहनत से अमन का रास्ता हमवार किया। डॉ ज़ाकिर हुसैन साहब की निगरानी में यह सब हुआ।

अब फिर वक़्त आ गया है कि यहां के आम लोग, तंज़ीमें, ट्रेड यूनियन, समाजी और सयासी कारकून, जामिया मिल्लिया के बेदार लोग आगे आएं और फिरक़ापरस्ती का यह नासूर कोई बड़ी वारदात में बदले उससे पहले ही इसे जड़ से उखाड़ फेंकें।

अब्दुल रशीद अगवान

CAPTION: Homepage photo sourced

DISCLAIMER: The views expressed in the write-up is of the author Abudl Rasheed Agwan and they don’t not necessarily represent OT.COM’s views and opinions

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