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सफर डर के साये मे!!!

मै 2008 से दिल्ली रहता हूं और लगभग हर बार बिना किसी बड़े-बूढे के साथ सफर करता हूँ मगर मेरे पापा कभी भी न डरे/सहमे तो दूर के बात मेरे बैग वगैरह की चोरी के बारे मे कोई नसीहत भी न करते मगर इस बार बहुत ज्यादा ताकिद की और कहा ये चिकेन खाना मे ले जाने का सगूफा किसका है? A write-up by Imran Ahmad.

भिड़तंत्र से इतना डरे क्योंकि वह रोज अखबार पढते है और आज से नही बल्कि न जाने कबसे?

मूझे जबसे होश है कम-अज-कम तबसे क्योंकि मै बचपन से अखबार पढता था मगर मनहमोन सरकार खत्म होने के बाद मेरा आदत जो थोड़ा बहुत electronic media और कमो-बेस अखबार वो भी annihilate हो गया।

और हां पहले मेरे घर उर्दू अखबार भी आता था और हिन्दी मे हिन्दुस्तान मगर अब तो सिर्फ भारत वालो का प्रभात खबर आता हैं आखिर इस बदलाव का वजूहात का है मूझे कोई समझ नहीं।

मगर इन सब से अलग मेरी अप्पी का reaction पूछी अबे गदहे तूम्हे चिकेन से कोइ परेशानी तो नहीं हैं? जाहिर है मेरा सवाल नफी ही होगा।

आप सोचेंगें कि मेरी बहना बहूत इंकलाबी हैं मगर असल मे आप मूगालते में हैं क्योंकि वह न ही मिडीया किसी भी के तरह और न ही सोशल मिडीया से बाखबर हैं,हां whatsapp और IMO खूब इस्तेमाल करती हैं नही तो वो मूझे ट्रेन सफर करने ही न देती।

मगर मेरे पापा ने यहाँ तक कहा कि सफर के दौरान किसी बहस-मूबहासा मे भी न पड़ना।

मगर सवाल ये है कि मेरे पापा को ये ड़र क्यू सता रहा है??

मैने तो fundamental वजह पहले ही वाजेह कर चूका हूं।

मगर इसके अलावे और भी वजूहात है जैसे कि मै उनके लिए potential lynchings candidate हो सकता हूँ अपने रूप और वस्त्र के वजह से (कूर्ता पजामा और मियाँ भाइ वाला दाढ़ी ) और गलती से उनमे कोइ मेरा फेसबूक वाला घर देखा हो तो खैर ही नहीं।

उसके अलावा हूकूमत के खिलाफ बेबाकी से राय देना वगैरह वगैरह वगैरह।

इसी दौरान एक जूनैद के पापा का बहस एक साहब से सिट के लिए थोड़ा तकरार हूआ तो मेरे आॅखो के सामने बलबगढ का जूनैद आने लगा बहरहाल अब दिल्ली मे सूकून से पहुँच गया।

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