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उस मुस्लिम बच्ची ने आसमान तो छू लिया मगर अहसास कमतरी ने उसे अपनी जान लेने पर मजबूर कर दिया

उस मुस्लिम बच्ची ने आसमान तो छू लिया मगर अहसास कमतरी ने उसे अपनी जान लेने पर मजबूर कर दिया।

कर्नाटक के मलूर गांव की रफशिना चार दिन पहले अख़बार की हेडलाइन बनी कि एक ग़रीब मुस्लिम परिवार की लड़की ने कर्नाटक बोर्ड को टॉप किया और 1200 में से 1180 नंबर लाकर एक मिसाल क़ायम की। मगर शायद अपनी ग़ुरबत का ज़िक्र अखबार में देखकर उसे अहसासे कमतरी ने ख़ुदकुशी पर मजबूर कर दिया। एक टूटते तारे की तरह वह खुले आसमान में चमकी और फिर हमेशा के लिए अंधेरे का हिस्सा बन गई।

इस भयानक हादसे से दो बातें सामने आती हैं। पहली यह कि मेहनत-मजदूरी करने वाला तबक़ा समाज में इज़्ज़त हासिल नहीं कर पाता और 1 मई को मजदूर दिवस पर उसका ज़िक्र होता है, मेहनत-मजदूरी को एक इबादत का दर्जा दिया जाता है और बस। दूसरी बात यह कि वालदैन की कम तालीम उस बच्ची की सही परवरिश में रुकावट हो सकती है मगर उसके आसपास क्या कोई एक शख़्स भी ऐसा नहीं था जो उसे इस्लाम की चंद बुनियादी बातें ही सिखा देता जिसमें ख़ुदकुशी का हराम होना भी शामिल है। यह हादसा एक तरफ तो समाज में मौजूद उस रवैये को उजागर करता है जिसमें पैसे की पूजा होती है और ग़रीब को इज़्ज़त हासिल नहीं होती और दूसरी तरफ इस्लाम के नाम पर नई नस्लों तक सही पैग़ाम की कमी ज़ाहिर होती है।

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ऐसे में पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की वो बात याद आती है जिसमें आपने फरमाया है कि सबसे अच्छी कमाई वो है जो इंसान अपने हाथ से कमाता है। क़ुरआन की वो आयतें भी याद आती हैं कि अल्लाह ने ऐसी अज़ीम तहज़ीबों को फना कर दिया जिसमें ख़ाक़नशीनों की परवाह और इज़्ज़त नहीं होती थी।

This Hindi version has been adapted by social activist Rashid Agwan from a report published in OT.COM a few days ago. Agwan, a senior member of Mushawarat, is a resident of Okhla and also runs an NGO that deals with local issues

DISCLAIMER: The views expressed in the report are of the author and the post
does not necessarily represent OT.COM’s views and opinions

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