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Teen Fatima leads women tarawih prayer in Okhla, finishes it

रहमतों और बरकतों के महीनों में जामिया नगर के अबुल फज़ल में औरतों के लिए 17 दिन से चल रहा खत्म तराबी का नमाज़ मोकम्मल हो गया। reports जौवाद हसन

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माहरुख फ़ातिमा (ऐरम)
जामिया मिल्लिया इस्लामिया की वह स्टूडेंट जो कि12 साल की उम्र में कुरआन ए करीम हिफ़्ज़ मोकम्मल कर हाफिज ए कुरान बन गई। कुरआन सुनाते समय उनकी आवाज़ में वह खनक होती है, जो बहुत कम उलमा में पाई जाती है।

छोटी उम्र में वह बिना देख जब कुरआन की तिलावत करती है, तो सुनने वाले भी बड़े अदब और ख़ामोशी से इबादत में मशगूल हो जाते है। रमजान में लगातार पांच सालों से कुरआन (तराबी) सुना रही है।

बचपन से ही हाफिज बनने का इन्हें शौक था, सो पूरा भी हुआ। और यही वजह है कि मुस्लिम लड़किया आज हर क्षेत्र में ज़माने के साथ चलने में कहीं पीछे नहीं है। तभी तो दुनियावी तालीम के साथ-साथ दीनी तालीम में भी आगे बढ़ रही है। 18 साला हाफ़िज़ा माहरुख फ़ातिमा जामिया मिल्लिया इस्लामियाय से इसी साल 12 वीं में 80% नंबर से पास होने के बाद जामिया में ही ईटीई में अड्मिशन लिया है।

हाफ़िज़ा ने कहा कि हम खुशनसीब है कि हमारे सीने में कुरआन है। हाफिज़े कुरआन बनने के बाद मुझे ज़िन्दगी का सबसे बड़ा तोहफा मिल गया। छोटी सी उम्र में यह मेरे लिए बड़ी ख़ुशी बात है। हाफ़िज़ा माहरुख इस कामयाबी को यू बयां करती है, जो कुरआन हज़ूर-ए-पाक पर नाज़िल हुवा हो उसे हमने मोकम्मल याद कर लिया है। इससे बड़ी ख़ुशी और क्या हो सकती है, कहती है की अल्लाह से दुआ करती हूं कि इस कुरआन-ए-मज़ीद को सभी लोगों तक पहुंचाए, हाफ़िज़ा होने का श्रेय अपनी अम्मी को देती है, जो कि इस दुनिया में नहीं रही।

जौवाद हसन जो कि माहरुख के मामा है, उन्हों ने बताया की माहरुख कि अम्मी फ़हमीदा खातून की मौत 1 जून 2016 को दीन के काम (इस्तेमा) में शिरकत के लिए ई रिक्शा से अबुल फज़ल जा रही थी की, के 4 नंबर पर तेज़ रफ़्तार बायकर ने उनको जोरदार टक्कर मारी जिससे कि उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

हालांकि 25 दिन बीत जाने के बाद भी इस मामले में नहीं कर है

पांच भाई-बहन में माहरुख अपने माँ बाप की सब से बड़ी औलाद है, गौहर आदिल (ग़ाज़ी), सरवर आदिल (अमान), अनवर आदिल (लुकमान), नुदरत फ़ातिमा (सोनम)। माहरुख अपने अब्बू डॉक्टर आदिल अहमद, से लिपट कर रोते हुवे कहने लगी कि अम्मी के जाने के बाद अब समझ में नहीं आ रहा है कि पढ़ाई करु कि भाई बहन को देखू, कुछ देर बाद अपने-आप को संभालने के बाद कहती है कि अल्लाह बहुत बड़ा है।

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2 comments

  1. مرحومہ جیسی نیک خاتون آج شاذونادر ہی ہوتی ہیں۔ افسوس شعبان کی کوئی اول تاریخ کا یہ واقع ہے ہمیشہ کی طرح انہوں نے مجھے بلایا تھا اور بریانی بھی کھلائیں، چائے پانی کو پوچھا۔مرحومہ کے شوہر بھی بہت ہی ملنسار ہیں۔ آج وہ ہوتیں تو ہر سال کی طرح امسال بھی ایک دن مردوں کا اجتماعی افطار کراتیں۔ خاتون کی تراویح کا نظم تو وہ ہر سال کراتی آرہی تھیں۔ جس کی امامت ان کی ہی لائق دختر نیک اختر کرتی رہی ہیں۔ اور بھی بہت سی یاد داشتیں ان سے وابستہ ہیں۔ مگر کیا لکھوں کہ میں آج بھی صدمے میں ہوں۔

    • اللہ ہر کسی کو ایسی فیملی ایسا ماں باپ اور بچے بچیاں عطا کرے۔ آمین

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