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एग्जिट पोल की पोल

जियस जूनियर: समाचार चैनलों ने एग्जिट पोल के नाम पर उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बना दी है. कल मतदान खत्म होने के बाद से ही विभिन्न टीवी चैनलों पर एग्जिट पोल के नतीजे दिखाए जाने लगे. इन नतीजों की विश्वसनीयता किसी से छिपी नहीं है. दिल्ली और बिहार चुनाव में लोगों के सामने इन पोल की पोल खुल चुकी है.

इन नतीजों को देखकर खुद बीजेपी के कुछ लोगों को भरोसा नहीं हो रहा है. बुनियादी स्तर पर काम करने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं को लग रहा है कि मीडिया उनकी उक्वमीद से ज्यादा सीटें दे रहा है. उनके अनुमान भी अलग-अलग हैं.  और यह बेजा नहीं है. बताया जाता है कि मतदान शुरू होने से पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने बीजेपी को 39 सीटें मिलने की उक्वमीद जताई थी. संघ के आकलन पर भरोसा इसलिए किया जाना चाहिए कि उसके कार्यकर्ता गली-मोहल्लों में सक्रिय रहते हैं और लोगों की नब्ज पर उनकी उंगली रहती है. खुद खबरनवीसों की एक जमात इस नतीजे से सहमत नहीं है. जब सबको मालूम है कि 48 घंटे में जनता का फैसला लोगों के सामने होगा तो फिर जनमत सर्वेक्षण एग्जिट पोल के नतीजों पर घंटों बहस-मुबाहिसा क्यों?

जिन लोगों को मालूम है वे अच्छी तरह जानते हैं कि 24 घंटे चलने वाले चैनल को चलाने के लिए काफी पैसा खर्च करना होता है. यह पैसा उन्हें मुक्चयत: विज्ञापन से मिलता है. विज्ञापन देने वाले यह देखते हैं कि कौन-से से चैनल ज्यादा देखे जाते हैं और उन्हें देखने वालों की आर्थिक स्थिति कैसी है. क्यों वे उन उत्पादों को खरीद सकते हैं जिनका विज्ञापन किया जाना है. चूंकि टीवी पर दिखने वाले ज्यादातर विज्ञापन उपभोक्ता वस्तुओं के हैं, लिहाजा सबको कुछ न कुछ विज्ञापन मिल ही जाता है. फिर विज्ञापनदाता यह भी जानते हैं कि किसी उत्पाद को खरीदने की क्षमता यानी क्रेय शन्न्ति मध्य वर्ग के युवाओं में हैं. और ये युवा भारत के प्रधान सेवक नरेंद्र मोदी को अपना नायक मानते हैं और उनका समर्थन करते हैं. चुनाव के असली नतीजे तो कोई बदल नहीं सकता लिहाजा उन्हें किसी तरह खुश कर दिया जाए.

और उन्हें खुश करने का एक ही तरीका है कि असली नतीजे आने से पहले उनके मन की बात की जाए. इस तरह वे विज्ञापन देखते हुए अपना मनोरंजन कर लेंगे. अगर कोई प्रोग्राम मनोरंजक नहीं है तो कोई चैनल भला उसे क्यों दिखाएगा, अपना कारोबार क्यों ठप करेगा? आखिर, यह भी किसी दूसरे कारोबार की ही तरह एक कारोबार है. कमाई का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए.

लिहाजा, 48 घंटे का इस्तेमाल मनोरंजन के लिए हो गया. दर्शकों को रिझाकर विज्ञापनदाताओं ने अपना पैसा वसूल लिया. अब कुछ घंटों बाद असली नतीजे आ जाएंगे. चैनल खुश, दर्शक खुश और विज्ञापनदाता भी खुश. और क्या चाहिए?

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