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गुलिस्तान-ए-गालिब इन दिनों दिवाली के दीपों से जगमग हैं जामिया में

“कल शाम एक बार फिर जामिया में दीपोत्सव मनाया गया। ऐसा लगता है कि मानों हम सभी इस पर्व को पूरी तरह से जी लेना चाहते हों. मैं कल फिर खुद को इस जश्न-ए-दिवाली से रोक न सका और इसमें शरीक होने पहुंच गया….

“वहीं गुलिस्तान-ए-गालिब, जो इन दिनों दिवाली के दीपों से जगमग हैं, वहाँ सजी एक खूबसूरत रंगोली जैसे चांद की चाँदनी उसका श्रृंगार कर रही हों. इन सब के बीच, हौले-हौले चलती शाम की ठंडी हवा और मूर्ति में हमारे अपने गालिब साहब, जैसे मूर्ति ना होकर हम सभी को एक साथ देखकर मुसकुरा रहे हों, और सोचते कि इस मुल्क में मज़हबी एकता व भाईचारे के असली नुमाइंदे, शहर के उस सिरे में ऐशों-आराम से रहते वो तमाम सियासतदार नहीं, बल्कि यहाँ इस तरफ दीये जलाते और एक सुर में अमन-चैन के गीत गाते यह जामिया के बच्चें हैं….

“कुछ देर बाद, मैं अपने यूनिवर्सिटी के चीफ़ प्रोक्टर प्रोफेसर हारुन सज्जाद सर से भी मिला. मुझे बहुत अच्छा लगा कि प्रोक्टर सर मुझे देखते ही गले से लगा लिए और दिवाली की शुभकामनाएँ दीं. मैंने भी उन्हें त्योहार की मुबारकबाद दीं। बाद में मैंने उनकी पूरी टीम के साथ तस्वीरें भी खिचवाई….

“वाकई किसी को भी मज़हबी एकता और भाईचारे को जीना हों, तो जामिया मिल्लिया इस्लामिया इसके लिए सबसे अच्छी जगह हैं….

“कल की एक आम-सी शाम मेरे लिए बहुत ख़ास रही। रोज़ की तरह कल भी जब मैं क्लास के बाद अपने घर का लंबा सफर शुरू करने ही वाला था कि मैंने अपने कैंपस में कुछ अलग देखा। अपनी युनिवर्सिटी के गुलिस्तान-ए-गालिब में मिर्ज़ा गालिब की विशाल मूर्ति के ठीक नीचे बहुत सारे लोग दिवाली के दिये जला रहे थे। यह देखकर मन बहुत खुश हुआ और मैं वहाँ थोड़ी देर और रुकने का फैसला किया।

“मुझे एक बार फिर आज यह एहसास हुआ कि पूरे हिंदुस्तान में मेरा यह इदारा सबसे वाहिद है। यह गंगा-जमुनी तेहज़ीब की मरकज़ मेरा अपना जामिया मिल्लिया इस्लामिया ही है, जहाँ एक दूसरे को गले लगाकर ईद में सेवई की खीर भी साथ खाते है और वहीं दिवाली के दिये भी साथ रौशन करते है।

“यह शायद हमारे इदारे की बुनियाद रखने वाले उन महान शख्सियतों के ही सपने हैं, जिन्हें हम आज जी रहे हैं। इसे किसी की नज़र ना लगे।” wrote Shubham Kumar Pandey, a student of Jamia Millia Islamia on his social media timeline.

Also, he shared a few photos of the event.

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