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बेगम जानः जान है इस फिल्म में

सुशील कुमार

बेगम जान श्रीजीत मुखर्जी की बंगाली फिल्म राजकहानी का हिंदी रूपांतरण है. फिल्म की कहानी भारत की आजादी और विभाजन को पृष्ठभूमि में रखते हुए कई मसलों और मुद्दों पर सामाजिक टिप्पणी है. फिल्म से जाहिर है कि बंटवारे की एक रेखा कितने लोगों के जीवन को उलट-पलटकर रख सकती है. हालांकि इस तरह की पहली बनी फिल्मों में आम अदामी के जीवन को केंद्रित किया गया है (जैसे पिंजर) लेकिन इस फिल्म में बंटवारे का असर एक वेश्यालय और उसके बाशिंदों पर दिखाया गया है. फिल्म में वेश्यालय की मुख्य मैडम ‘बेगम जान’ (विद्या बालन) पूरे सामाजिक, राजनैतिक, सरकारी तंत्र से आखिरी दम तक लड़ती है. इसकी कहानी मामूली है क्योंकि किसी भी वेश्या प्रधान फिल्म की तरह नाच गाने सहित देह व्यापार को भी दिखाया गया है. लेकिन यह फिल्म पूरी तरह से वेश्यावृत्ति पर ही केंद्रित है और ऊंचे आदर्शों को दूर ही रखा गया है. अगर यह फिल्म यहीं तक सीमित रहती तो ठीक था लेकिन यह फिल्म इतने पहलुओं को जोड़ती है जिन्हें गिनना मुश्किल है.

गौर करें इन पर—राष्ट्रवाद या फिर उसमें छुपा हवस, महिलाओं की सामाजिक स्थिति और उनके साथ अन्याय, लिंगभेद और नारीवाद, बाल विवाह और विधाओं के साथ अन्याय, बाल यौन उत्पीडऩ, देश की बहुसांस्कृतिक-बहुधार्मिक संस्कृति, खासकर निक्वन सामाजिक वर्गों में प्यार और अधिकार, प्रतिभागिता, वफादारी, कानून के रक्षक की भक्षक बनने की प्रवृत्ति, कानून को हाथ में लेने की प्रवृत्ति और राज्य की ओर से स्वीकृत गुंडागर्दी और अफसरशाही. और यही नहीं दिल्ली में बस का वह दिल दहला देने वाला बलात्कार कांड और मणिपुर में सेना के खिलाफ इरोम शर्मिला का नग्न विरोध प्रदर्शन भी इस फिल्म में इंगित है. दरअसल, यह फिल्म एक कोलाज है, जिसमें कई विर्षों को पेश करने की कोशिश है. ऐसा किसी साहित्यिक कृति में तो आसान है लेकिन फिल्म में लगभग नामुमकिन लगता है.

बॉलीवुड में इस तरह की फिल्म को याद करने पर मंडी का ध्यान बरबस आ जाता है. लेकिन उसमें जमीन-जायदाद की वजह से उत्पात शुरू होता है. वेश्याओं के नाच-गाने युक्त विषयों पर पाकीजा, देवदास, साहिब बीवी और गुलाम, शराफत, मुकद्दर का सिकंदर, उमराव जान और चांदनी बार फिल्में बन चुकी हैं. व्यक्तिगत विषयों पर आईना, प्यासा, मौसम, चमेली जैसी फिल्में बनी हैं. दोनों तरह की फिल्मों ज्यादातर किसी व्यक्ति के संघर्ष को दिखाया गया है. बेगम जान में ऐसा कोई व्यक्ति साथ नहीं देता, सिर्फ एक गार्ड को छोडक़र. फिल्म में पिंजड़े में बंद चिडिय़ा का प्रतीक नहीं इस्तेमाल नहीं किया गया हालांकि एक सफेद पक्षी है पर पिंजड़े में नहीं है.

फिल्म में सीपिया टोन में इतिहास को दूसरी फिल्मों की तरह ही दिखाया गया है. प्रयोग के तौर पर आधे चेहरे को पूरे स्क्रीन पर या स्क्रीन के कोने पर दिखा गया है जो दर्शकों में कौतूहल पैदा करता है. और आजकल लगता है कि बॉलीवुड में हवाई शॉट वाली तकनीक का प्रचलन बढ़ गया है (इस फिल्म में प्रेमियों का चट्टान पर प्रेम दृश्य, आजादी मिलने पर जश्न मनाते लोग और अफसर का मानचित्र देखते). ठीक इसी तरह फिल्मों में ट्रॉली और क्रेन पर लगे कैमरे का प्रचलन शुरू हुआ था. फिल्म के पहले दृश्य में विद्या बालन का पलंग पर लेटकर आंखें घुमाना गब्बर सिंह पर फिल्माए दृश्य को ताजा कर जाता है.

फिल्म का आर्ट डेकोर समकालीन वास्तविकता के करीब है. खासकर हुक्का, जग, बर्तन, लैंप के रंगीन शीशे, टेंट, कंपास, ऑप्टिकल स्क्वैयर, नक्शे जैसी चीजें. लंबी आरमदेह कुर्सी और पलंग बंगाली शिल्प को दर्शाते हैं. वेश्याओं की वेशभूषा काफी फैशनेबल है और उनका मैला-कुचलापन प्रभाव तो पैदा करता है लेकिन कलाकारों की एैंक्टिंग और चाल वेश्याओं जैसा इफेक्ट पैदा नहीं करती.

फिल्म के संवाद अच्छे हैं और सभी मूल किरदारों ने कहे (खासकर मासिक धर्म से जुड़े और शारीरिक संबंध की परिभाषा देते हुए). फिल्म का संगीत बहुत अच्छा है पर अधूरा लगता है. वैसे लाइट क्लासिकल पसंद करने वालों को यह पसंद आएगा.

पूरी फिल्म जैसे विद्या बालन के कांधों पर टिकी है और उन्होंने अच्छी भूमिका निभाई है. निर्देशक ने कई पुराने कलाकारों को स्क्रीन पर दोबारा जन्म दिया है, जैसे विवेक मुश्रान, चंकी पांडे, रंजीत कपूर और आशीष विद्यार्थी. पांडे ने अपनी छाप छोड़ी है. इला अरुण एक मौसी के रूप में ठीक हैं.

फिल्म की कहानी एकरेखीय होने के बावजूद कई मोड़ों पर टर्न लेती है जैसी कि भारतीय ऐतिहासिक-पौराणिक कथाओं (लक्ष्मीबाई, पद्मावती, मीरा) का क्रलैशबैक, दो अफसरों के बीच संबंध और कई सब प्लॉट/सब टेक्स्ट पर चली जाती हैं. कहानी और स्क्रिप्ट की कमी को बालन के डायलॉग्स से पूरा करने की कोशिश की गई है. कई जगहों पर शोर से साउंड इफेक्ट की कमी दूर करने की कोशिश की गई है.

फिल्म में अन्य वेश्याओं के चरित्रों को भली-भांति डेवलप नहीं किया गया है और इसीलिए वे बालन के साथ सिर्फ स्क्रीन पर साथ निभाने के लिए आई लगती हैं.

दर्शकों को नारीवाद, सामाजिक प्रतीकों और उनके अस्तित्व के पहलुओं को फिल्म में एक साथ सम्मिश्रण आसान होता है, खासकर जब दर्शक मूलत: मनोरंजन के लिए ही सिनेमा घर में जाता है. हां, अगर मनोरंजन के लिए एक मैसेज भी मिले तो अच्छा रहता है—जैसे दंगल, पीके, 3 इडियट्स फिल्में करती हैं. बेगम जान जैसी फिल्म बहुत कुछ कहना चाहती है और खुद के लिए समस्या पैदा कर लेती हैं. जैसे कि फिल्म में सामूहिक आत्महत्या और उसका पद्मावती के साथ सती संदर्भ को आम आदमी के लिए समझना मुश्किल है. हालांकि बंगाल में इस तरह की फिल्में सफल हो सकती हैं न्न्योंकि वहां सत्यजीत राय, ऋतुपर्णो घोष, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, अपर्णा सेन जैसे फिल्मनिर्माता और जानकार पद्ब्रिलक का इतिहास है.

संक्षेप में यह फिल्म ईमानदार कोशिश है. आजकल जहां हर सिचुएशन और सीन स्पांसर्ड है, वहां एक यह एक सच्ची फिल्म है. फिल्म ज्यादा पैसा नहीं बना पाएगी पर अच्छी फिल्म बनाने की कोशिशों में एक महत्वणूर्ण शृंखला का हिस्सा रहेगी.

गोल्फ के शौकीन वरिष्ठ आइएएस अधिकारी सुशील कुमार फिल्म विश्लेषक भी हैं.

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